श्री. जमनालाल बजाज (1889 - 1942)

श्री जमनालाल बजाज (4 नवंबर 1889 – 11 फरवरी 1942) एक उद्योगपति, परोपकारक और स्वतंत्रता सेनानी थे.

उनका जन्म सीकर जिले के एक छोटे गांव काशी-का-बास में 4 नवंबर, 1889 को कानीराम और बिरदीबाई के यहां हुआ था. बाद में उन्हें सेठ बछराज और उनकी पत्नी सद्दीबाई ने उन्हें अपने पोते के रूप में गोद लिया.

सेठ बछराज के मार्गदर्शन में जमनालाल जी ने परिवार के बिज़नेस में भाग लेना शुरू किया और एक व्यापारी बनने के मूल गुणों- सटीक लेखांकन तथा माल की खरीद-बिक्री - के बारे में जानकारी प्राप्त की और धीरे-धीरे इस क्षेत्र में उत्कृष्टता हासिल की. 1926 में उनके द्वारा स्थापित किया गया उपक्रम आज बजाज ग्रुप आफ इंडस्ट्रीज के नाम से जाना जाता है. आज, बजाज ग्रुप ऑफ इंडस्ट्रीज़ में 24 कंपनियां शामिल हैं जिनमें से 6 लिस्टेड कंपनियां हैं.

पहले विश्वयुद्ध के दौरान, ब्रिटिश सरकार ने जमनालाल जी की नियुक्ति एक मानद मजिस्ट्रेट के रूप में की. जब उन्होंने वार फंड के लिए पैसे दान किए तो उन्हें राय बहादुर की उपाधि दी गई.

वे महात्मा गांधी के घनिष्ठ सहयोगी और अनुयायी थे, जिन्होंने उन्हें अपने पांचवें बेटे के रूप में अपनाया था. जमनालालजी ने गांधीजी के जीवन-दर्शन, उनके सिद्धांतों जैसे अहिंसा, और गरीबों को उनके समर्पण में रुचि ली. उन्होंने गांधी के दृष्टिकोण को समझ लिया कि स्वदेशी ही भारत की गरीबी मिटाने का उपाय है और खादी को बढ़ावा देने के लिए भारत भ्रमण के दौरान इस बात का काफी प्रचार किया.

1920 में, जमनालालजी को भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के नागपुर सत्र के लिए रिसेप्शन कमेटी का चेयरमैन चुना गया. उन्होंने ब्रिटिश सरकार द्वारा उन्हें प्रदान की गई राय बहादुर की उपाधि को त्याग दिया और 1921 में असहयोग आंदोलन में शामिल हुए. बाद में, 1923 में, उन्होंने ध्वज सत्याग्रह में भाग लिया, नागपुर में राष्ट्रीय ध्वज फहराने पर प्रतिबंध को नकार दिया, और उन्हें ब्रिटिश सेनाओं द्वारा हिरासत में ले लिया गया. इसने उनकी राष्ट्रीय स्तर पर प्रशंसा हुई. बाद में उन्हें कांग्रेस कार्यकारी कमिटी के सदस्य के रूप में चुना गया और 1933 में, कांग्रेस का कोषाध्यक्ष बनाया गया.

अस्पृश्यता को दूर करने के उद्देश्य से, उन्होंने अपने गृहनगर वर्धा में हरिजनों को मंदिर में प्रवेश न देने के मुद्दे पर संघर्ष किया. इस मामले में उठी घोर आपत्तियों के बीच, उन्होंने हरिजनों के लिए 1928 में वर्धा में अपना पारिवारिक मंदिर, लक्ष्मी नारायण मंदिर खोला. यह भारत का पहला मंदिर था जो हरिजनों को प्रवेश देता था.

जमनालालजी ने अपनी अधिकांश प्रापर्टी गरीबों को समर्पित की. उन्होंने महसूस किया कि विरासत में मिला यह धन लोगों के लाभ के लिए इस्तेमाल किया जाना चाहिए. यह गांधीजी द्वारा प्रस्तावित ट्रस्टीशिप अवधारणा के अनुरूप था. साथ ही महत्वपूर्ण बात यह है कि केवल 4 सालों की औपचारिक शिक्षा के बावजूद वे 20 सालों के अधिक समय के लिए इंडियन नेशनल कांग्रेस के कोषाध्यक्ष रहे, यह उनकी तीक्ष्ण बुद्धि और कुशाग्रता का प्रमाण है.